Friday, 13 July 2012

आखिर कब होगा दुष्कर्मों का अंत


आखिर कब होगा दुष्कर्मों का अंत :

 भारतीय समाज में स्त्री को देवी स्वरूप माना जाता है, की पूजा की जाती है. परंतु  कटु सत्य यह है कि हमारे समाज में सदियों से स्त्री को हमेशा उपभोग की वस्तु ही माना गया है . कुछ लोगों की नीच, तुच्छ संकीर्ण मानसिकता के कारण स्त्रियों को पूजना तो दूर समाज में उन्हें सम्मान तक प्राप्त नहीं हो पाता ..... ऐसे लोगों के लिये स्त्री मात्र पुरुषों की जरुरतें पूर्ण करने वाली मशीन है और उसका जिस्म खिलवाड़ करने की वस्तु.

हमारे देश भारत  में स्त्रियों के साथ बलात्कार के मामले प्रतिदिन सामने आते हैं. जो  स्त्री के अस्तित्व , उसकी स्वतंत्रता , अस्मिता , सुरक्षा समाज में स्त्रियों के स्थान पर सवाउठाते हैं. आए दिन होने वाली ऐसी वारदातों से हम अंदाज लगा सकते हैं कि हमारा समाज किस दिशा की ओर जा रहा है. समाज तो केवल मौन धारण किये हुए है. बलात्कार करने वाले यह नहीं देखता ना ही सोचता है कि उक्त महिला कौन से धर्म , जाति की है. ऐसी वारदातों को अंजाम देने वाले व्यक्ति अपनी हवस की आग में इतने पागल अंधे हो जाते हैं कि उनमें दया, करुणा , इंसानियत , शर्म आदि भावनाओं का भी अंत हो जाता है . विकृ्त मानसिकता के ऐसे लोग प्रतिष्ठा कद को ताक पर रख कर इस बात पर कतई ध्यान नहीं देते कि वे किस प्रकार का घृ्णित कार्य कर रहें हैं. अपनी हवस के आगे वे इस बात को भी भूल जाते हैं कि जिस स्त्री की इज़्ज़त को वे तार- तार कर रहे हैं, वैसी ही किसी स्त्री की कोख से न्होंने भी जन्म लिया है. ऐसे घृ्णित लोगों के कारण हर रोज कहीं कहीं इंसानियत शर्मसार होती रहती है.


वारदातें तो ऐसी भी सामने आईं कि लड़की के विरोध करने पर बलात्कार में असफल होने पर दुराचारी कहीं लड़की की आँखें फोड़ देते हैं तो कहीं उन मासूमों की ज़िंदगी ही खत्म कर देते हैं.
प्रश्न यह उठता है कि आखिर समाज में महिलाओं की स्थिति कब सुधरेगी. कब हमारे समाज में स्त्रियों के लिये माहौल पूर्णतया अनुकूल होगा. स्त्री के नाम पर ढकोसलों से परे कब लोगों की महिलाओं के प्रति संकीर्ण तुच्छ मानसिकता का जड़ मूल समेत अंत होगा. आखिर कब?????  क्या प्रश्न देश की कानून व्यवस्था पर खड़ा होता है? मेरे  अनुसार तो इसका जवाब है : नहीं .. क्योंकि कानून व्यवस्था चाहे जितनी सख्त क्यों हो जाए ...जब तक लोगों की सोच में बद्लाव नहीं आएगा तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी क्योंकि यहाँ मसला नैतिकता समाजिकता का है. वैसे भी जब किसी की सोच ही गंदी घृ्णित हो तो उससे लाख सख्ती बरतने पर भी अच्छे व्यव्हार की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है.

बलात्कार की वारदातों में यह भी कड़वी सच्चाई प्राय: सामने आती है कि ज्यादातर महिलायें उनके साथ हो रहे शारीरिक शोषण के खिलाफ आवाज़ नही उठातीं , तो कभी परिवार की बदनामी के डर पारिवरिक सदस्यों के दबाव में आकर , उनके साथ हो रहे अत्याचार को सहती रहती हैं और लोग उनकी इज़्ज़त से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते हैं...... यदि स्थिति में सुधार आया तो महिलाओं के साथ होने वाले ये दुराचार स्त्री अस्तित्व के लिये बेहद घातक चिंताजनक हैं.

समय के बदलने के साथ-साथ भारतीय समाज , विकास और देश की तरक्की की ओर अग्रसस तो हुआ , लेकिन सामाजिक सोच अब भी वही घिसी पिटी बरकार है. हमारे देश की व्यवस्था व लोगों की संकुचित सोच का ही परिणाम है कि हमारे समाज में ज्यादातर स्त्रियाँ अकेले थाने में मुकदमा लिखाने नहीं जाती हैं. वो भय से भी मुकदमा लिखाने में डरती हैं और आज-कल तो हमारे समाज में एक ढर्रा और बन गया है कि मुकदमा लिखाने का मतलब समय और पैसे की बरबादी के अलावा और कुछ नहीं है. समाज में स्त्रियों के अस्मिता की रक्षा व उनकी स्थिति में सुधार तभी संभव है जब हमारा समाज उनके प्रति संवेदनशील बने. बेतुके स्त्री विरोधी रीति -रिवाज़ों , परंपराओं व संकीर्ण मानसिकता व विचारों का अंत हो . जब तक आडंबर, दिखावे व ढोंग से परे जमीनी ह्कीकत को ध्यान में रखते हुए कोई ठोस रणनीती, हमारे समाज में स्त्रियों की स्थिति , स्वतंत्रता व सुधार के लिये नहीं बनती तब तक हम स्त्रियों को अपनी पह्चान , अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करते रहना पड़ेगा. 



                               -स्वप्निल शुक्ल

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4 comments:

  1. a very well written article on the most sensitive issue ...thanks for sharing .

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  2. inspiring article :)

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  3. anuradha tripathi, jaipur29 November 2012 at 03:26

    you have raised such a sensitive issue in a wonderful & appealling manner ... thanks a tonn for contributing such great thoughts through your blog....
    - anuradha tripathi, jaipur

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  4. interesting opinions !

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